रेगिस्तान में जल होने का भ्रम पूर्ण आंतरिक परावर्तन के कारण होता है। जब सूर्य की गर्मी से रेगिस्तान की रेत गर्म होती है तो उसके संपर्क में आने वाली वायु भी गर्म हो जाती है, परंतु इस वायु के ऊपर का तापमान क्रमश: कम होता जाता है। अत: वायु के नीचे की परतें अपेक्षाकृत विरल होती हैं और जब प्रकाश की किरणें पृथ्वी की ओर आती है तो इन्हें विरल परतों से होकर गुजरना पड़ता है, और प्रत्येक परत पर अपवर्तित किरण अभिलम्ब से दूर हटती जाती है। अत: प्रत्येक अगली परत पर आपतन कोण बढ़ता जाता है तथा किसी विशेष परत पर क्रांतिक कोण से बड़ा हो जाता है। तब इस परत पर किरण पूर्ण परावर्तित होकर ऊपर की ओर चलने लगती है। ऊपरी परतों के सघन होने के कारण ऊपर बढ़ने वाली किरणें अभिलम्ब की ओर झुकती जाती हैं। जब यह रेगिस्तान के यात्री की आँख में प्रवेश करती है, तो उसे पृथ्वी के नीचे से आती हुई प्रतीत होती है तथा यात्री को पेड़ का उल्टा प्रतिबिम्ब दिखायी देता है। इसी से रेगिस्तान में जल होने का भ्रम हो जाता है।
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Tuesday, August 4, 2015
Tuesday, June 16, 2015
वायुमंडल में ताप संतुलन (Heat Balance of the Atmosphere) क्या है ?
पृथ्वी को अधिकांश ऊष्मा (Heat) सूर्य से विकीर्ण ताप द्वारा प्राप्त होती है। सूर्य से विकीर्ण ताप लघु तरंगों ( Short Waves) द्वारा पृथ्वी को प्राप्त होता है। वायुमंडल सूर्य से विकीर्ण ऊर्जा (Energy) का केवल 14 प्रतिशत प्रत्यक्ष रूप में प्राप्त करता है। वायुमंडल को अधिकांश ताप की प्राप्ति (अप्रत्यक्ष रूप से), पृथ्वी से विकीर्ण ऊर्जा द्वारा प्राप्त होती है, जो कि दीर्घ तरंगों (Long Waves) के रूप में होती है। इस प्रकार पृथ्वी एवं वायुमंडल निरंतर सूर्य से ऊष्मा प्राप्त करते हैं। लेकिन यह उल्लेखनीय है कि फिर भी पृथ्वी तथा वायुमंडल का ऊष्मा भंडार बढ़ता या घटता नहीं, बल्कि सदैव संतुलित रहता है कि इसका तात्पर्य है कि पृथ्वी तथा वायुमंडल जितना ताप प्राप्त करते हैं, उतना ही शून्य में लौट जाता है।
Tuesday, May 26, 2015
तारों की आभासी गति का क्या कारण है ?
यदि हम आसमान में तारों को अधिक समय तक देखें तो हम पाते हैं कि तारे पूर्व में उदय होकर वृत्तीय पथ पर चलते हुए पश्चिम में अस्त हो जाते हैं जबकि वास्तव में वे आकाश में स्थिर होते हैं। इस गति में उनकी सापेक्षिक स्थितियां नहीं बदलती है। इससे ऐसा लगता है कि तारे पृथ्वी के परित: परिक्रमा कर रहे हैं अथवा खगोलीय गोला पृथ्वी के परित: घूर्णन कर रहा है। आसमान में पूर्व से पश्चिम की ओर गति करते हुए प्रतीत होते हैं। ध्रुव तारा पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के सीधे ऊपर स्थित होता है, अत: यह पृथ्वी की घूर्णन अक्ष की सीध में होता है जिसके कारण वह आसमान में स्थिर दिखाई देता है।
Monday, March 3, 2014
क्यों टूटते हैं तारे ?
उत्तर - आपने रात में तारे टूटते जरूर देखा होगा और फिर आंखें बंद कर कोई मुराद भी मांगी होगी। दरअसल आसमान से नीचे गिरती हुई चमकदार चीज तारा नहीं होकर, उल्काएं होती हैं।
ये उल्काएं सुई की नोक से लेकर कई किलो वजनी होती हैं। इन्हें बिना किसी उपकरण की मदद से भी अंधेरी रात में देखा जा सकता है। जब इन उल्काओं की सतह और वायु के बीच का घर्षण ऊर्जा उत्पादित करता है, तब ये उल्काएं पृथ्वी की तरफ बढ़ने लगती है और इस ऊर्जा और पृथ्वी के वातावरण के कारण छोटे आकार की उल्काएं जलने लगती हैं। इस कारण तेज रोशनी दिखती है और लगता है जैसे कोई चमकदार तारा आसमान से टूटकर जमीन की तरफ बढ़ रहा है।
खगोल शास्त्रियों ने पाया कि उल्काएं समूह में ही रहती हैं। जब छोटी उल्काएं तारे की तरह टूट कर गिरती नजर आती हैं, तब बड़ी उल्काएं भी पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करती हैं। ये बड़ी उल्काएं जब पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वाकर्षण के कारण आ गिरती हैं, तब उन्हें उल्कापिंड कहा जाता है। बहुत सारे उल्कापिंड बिना नष्ट हुए पृथ्वी पर एक साथ गिरते हैं, तो उसे उल्कापात कहते हैं।
खगोल शास्त्रियों ने पाया कि उल्काएं समूह में ही रहती हैं। जब छोटी उल्काएं तारे की तरह टूट कर गिरती नजर आती हैं, तब बड़ी उल्काएं भी पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करती हैं। ये बड़ी उल्काएं जब पृथ्वी की सतह पर गुरुत्वाकर्षण के कारण आ गिरती हैं, तब उन्हें उल्कापिंड कहा जाता है। बहुत सारे उल्कापिंड बिना नष्ट हुए पृथ्वी पर एक साथ गिरते हैं, तो उसे उल्कापात कहते हैं।
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